दुनिया के मजदूर एक हो ! मार्क्सवाद के गुरुओं ने 175 साल हुए यह नारा दिया था।
लेकिन कितने बिखरे हैं हम ! और उधर अमेरिका का एक दानवाकार पूंजी का स्वामी कहता है हम दुनिया के सारे स्थूलतम लाला एक हैं। हैं ही, नहीं क्या ? इस कतई आवारा चरित्र की वित्त पूंजी के प्रभुत्व के दौर में यही तो जारी है। दशकों क्या एक सदी हो गई है।
और हम किस एक बड़े देश में भी आज एक हैं?
तो सवाल यह उठता है कि इस एकीकरण में भाषाओं की विभिन्नता की समस्या को कैसे हल किया जाए? वैसे इस दिशा में जो भी थोड़ा, ज्यादा काम किया है वह दुनिया भर में अंग्रेजी भाषा ने ही किया है।
खैर ,पहले भारत के मेहनतकशों की बात करें।
हालिया मेहनतकश किसान जनता के जोरदार प्रतिरोध या 2020 के किसान आंदोलन पर बात कर ली जाए । अपने सिंघु बॉर्डर के हफ्तों के प्रवास में मैंने पंजाबी भाषा सीखने का प्रयास किया। यह प्रयास शहीद भगत सिंह की बहन बीबी अमर कौर पर लिखी अमोलक सिंह की पंजाबी भाषा की किताब ने भी मेरे लिए किया था। इन्हीं के कारण मैं गुरुमुखी लिपि को पढ़ना सीखा।
प्रसंगवश बता दूं कि पंजाबी और बांग्ला भाषा के अक्षरों में काफी समानता है। जवाहरलाल नेहरू वि .वि. की एक भाषा विज्ञान की प्रोफेसर के मुताबिक भारत में हिंदी और उससे संबंधित बोलियों को मिलाकर आधी भारतीय जनता हिंदी बोलती ,पढ़ती , समझती है। इस दिशा में आपसी संवाद स्थापित करने के लिए भारत का मजदूर किसान वर्ग लगभग सभी भाषाओं को लैटिन अथवा रोमन लिपि में लिखने का प्रयास कर सकता है।
क्या किसान आंदोलन का नेतृत्व खासकर संयुक्त किसान मोर्चा, अन्य मजदूर आदि के संगठन इस दिशा में प्रयास कर सकते हैं। इस दिशा में एक और काम किया जा सकता है। वह है रेल या बस द्वारा एक राज्य से दूसरे राज्य के किसानों, मजदूरों का लागत मूल्य लेकर पर्यटन में सहयोग।
जैसे ग्रामीण तमिलनाडु से ग्रामीण पंजाब में और ग्रामीण पंजाब से ग्रामीण तमिलनाडु में , बिहार से आंध्र और आंध्र से बंगाल में आपसी ग्रामीण पर्यटन। न केवल पर्यटन लेकिन संवाद करना, संबंध मजबूत करना।
एक इलाके द्वारा दूसरे की समस्या को समझना, संभव हो तो सुझाव देना, एक दूसरे के पारंपरिक भोजनों, संस्कृतियों से परिचय, एक संकट में दूसरे द्वारा मदद देना। जैसे पंजाब के बाढ़ के हालिया विनाश में किसी इलाके के लोगों का प्रतीकात्मक स्तर का ही सहयोग देना।
इस प्रकार किसान आंदोलन को मजबूत करने की दिशा में कुछ काम किया जा सकता है। यही बात मजदूर आंदोलन के लिए भी कही जा सकती है। छात्रों, युवाओं और महिलाओं के संगठन के बारे में भी। भारत के आशा कार्यकर्ता, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, मध्याह्न भोजन के स्कूली मजदूरों के बारे में भी यह किया जा सकता है।
(उमेश चंदोला का लेख)